मंदी की मारी जेट एयरवेज ने दो दिन पूर्व अपने 1900 कर्मचारियों को नौकरी
से निकालने का फरमान जारी किया तो सब तरफ हायतौबा मच गई। जिनकी नौकरियां गई वे इसलिए परेशान थे कि उन्हें अपने परिवार को हिस्सा बताने वाली कंपनी
ने उन्हें एकाएक बिना किसी चेतावनी के सडक पर लाकर छोड दिया तो समूचे
निजी क्षेत्र के शरीर में मंदी के इस अनपेक्षित प्रभाव को लेकर सिंहरन
दौड गई। लगा यूं मानों लीमेन ब्रदर्स के दिवालिएपन के बाद एक के बाद एक
वित्तीय कंपनियों के दिवालिया होने का जो सिलसिला चला था उसकी तस्वीरें
सबके जहन में उभर आई हो। ऐसा होना स्वाभाविक था चूंकि बैंकों व दूसरे
वित्तीय संस्थानों के धडाधड ध्वस्त होने की गति वास्तव में भयावह थी।
कहना न होगा ब्रिटेन में पिछले हफ़्ते हर पांच मिनट में एक वित्तीय उपक्रम
धूल चाट रहा था। उसको देखते हुए यह चिंता स्वाभाविक ही थी कि आने वाले
दिनों में जाने किस किस का हश्र जेट जैसा हो जाए।
आर्थिक दहशत के इस माहौल में जेट एयरवेज के आंगन में हुए धमाके पर
समाचार चैनलों की प्रतिक्रिया ठीक वैसी ही थी जैसी कि दिल्ली, अहमदाबाद
या बेंगलूरू बम धमाकों के बाद उन्होंने की थी। जेट के कर्मचारियों को
स्टूडियों में बिठाकर हमारे मित्र उनकी पीडा पर घंटों विलाप करते देखे
सुने गए। मुख्यधारा के एकाध चैनल को छोड दें तो सभी ने अपना प्राइम टाइम
इस घटनाक्रम को समर्पित कर वह परिस्थितियां निर्माण करने में अहम भूमिका
अदा की जिसके चलते जेट एयरवेज के स्वामी नरेश गोयल को देश के सामने आकर न
केवल नौकरी से निकाल बाहर किए गए कर्मचारियों को वापस लेने का ऐलान करना
पडा बल्कि उन्होंने अपने की इन युवा कर्मचारियों से क्षमायाचना तक की।
कर्मचारियों की बहाली पर प्रभावित कर्मचारियों ने मीडिया को उनके संकट के
समय साथ देने के लिए आभार जताते हुए कहा कि मीडिया यदि इस मामले को कायदे
से नहीं उठाता तो कर्मचारियों को जब चाहो जैसे चाहों नौकरी से निकाल बाहर
करने की खराब परंपरा अपने देश में भी डल जाती। निश्चय ही समाचार माध्यमों
व खासकर टेलीविजन चैनलों की इस घटनाचक्र पर प्रतिक्रिया स्वागतयोग्य थी
और उनके प्रयासों का प्रतिफल भी जल्द ही सामने आ गया चाहे उसकी असल वजह
आसन्न चुनावों पर टिकी सरकार की नजर रही हो या कुछ ओर। मगर जेट धमाका
अपने पीछे जो सवाल छोड गया उनमें एक सवाल का सीधा संबंध समाचार चैनलों व
समाचार पत्रों से है। जब इस प्रकार की घटनाएं स्वयं समाचार चैनलों के
आंगन में घटती हैं तो कहीं कोई उन पर इस प्रकार की प्रतिक्रिया क्यों
नहीं करता। कहने की आवश्यकता नहीं है कि जिस प्रकार की यकायक छंटनी जेट
एयरवेज ने करने की कोशिश की उस तरह की छोटी-बडी छंटनियां खुद मीडिया जगत
में गाहे-ब-गाहे होती रहती है। वास्तव में मीडिया संस्थानों की कार्यशैली
का अभिन्न अंग बन चुका है जेट की शैली में छोटे -बडे कर्मचारियों को
यकायक बाहर का रास्ता दिखाना। अनेक मामलों में तो आवश्यक नोटिस तक देने
की आवश्यकता नहीं समझी जाती। मगर विडंबना यह है कि समाज के किसी भी वर्ग
के साथ होने वाले अन्याय व अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले
मीडियाकर्मियों के साथ जब वैसा कुछ घटता है तो कहीं से कोई आवाज नहीं
आती। प्रभावित व्यक्ति या व्यक्तियों के पक्ष में न उनके अपने साथी
गूंजते-गरजते सुने जाते हैं और न ही समाज का कोई अन्य वर्ग उनके साथ खडा
दिखाई देता। और यह बात केवल छंटनी तक भी सीमित नहीं है। समाचार पत्रों
में कामकाजी पत्रकारों के वेतनमान की स्थिति किसी भी बाहरी व्यक्ति को
चौंका सकती है। सब संसार का दुखदर्द उजागर कर उसका उसकी दवा का इंतजाम
करने के मिशन पर लगे अधिकांश खबरनवीसों को उनके स्वामी वेतन-भत्तों के
रूप में क्या दे रहे हैं, वह अपने आप में इतनी बडी खबर हो सकती है जिसम
सैंकडों जेट एयरवेज जैसे मसले एक साथ समा सकते है। मगर यह आज तक न किसी
समाचार पत्र की खबर बनी हैं न किसी न्यूज चैनल की। जेट के कर्मचारियों की
नैया पार लगाने में अपने योगदान पर इठलाते मीडियाजगत के धुरंधरों को इस
मुकाम पर इस सवाल पर भी कुछ आत्ममंथन करने की आवश्यकता है।
- वीरेंद्र सिंह चौहान
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वीरेंद्र भाई,
आपने सही मुद्दा उठाया है, कि स्वयं मीडियाकर्मियों की छंटनी की खबर नहीं आती।
वैसे, मेरा तो यह मानना है कि मीडिया ने जेट कर्मियों को नौकरी से निकाले जाने को प्रमुखता दी, लेकिन वह भी इसलिए जेट एयरवेज के ये कर्मचारी व्हाइट कॉलर मजदूर हैं वरना, ऐसी छंटनी तालाबंदी तो भारत ही नहीं समूची दुनिया में आए दिन होती रहती है, लेकिन मीडिया ही नहीं जेट एयरवेज के ये मध्यवगीर्य मजदूर उसे मजदूरों की कामचोरी, गुण्डागर्दी आदि आदि का नाम देकर अनेदखा कर देते हैं।
मीडियाकर्मियों को भी आम मजदूरों के बारे में सोचना चाहिए, तभी आम जनता भी मीडियाकर्मियों की समस्याओं से सरोकार रखेगी ओर उनके समर्थन में आएगी, वरना यह बात सही है कि मालिक मीडियाकर्मियों को कब लात मार कर बाहर कर दे कोई भरोसा नहीं है और अलग-अलग रहने पर उनके पक्ष में कोई बोलेगा भी नहीं।
और सबसे बड़ी बात यह भी है यह मीडिया जब है ही मुनाफा कमाने के लिए तो उसके लिए मालिकान कुछ भी करेंगे और इसके लिए मेनस्ट्रीम मीडिया के बरक्स एक वैकल्पिक मीडिया भी खड़ा किया जाना चाहिए।
खैर, यहां मैंने बिखरी-बिखरी से बातें कहीं है, वरना आपने मुद्दा तो वाकई गंभीर उठाया है और उस पर और भी गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है।
हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है. नियमित लेखन के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाऐं.